3rd May / Death anniversary - Jagger Singh Arora
3 मई/पुण्यतिथि -मेजर जगजीत सिंह अरोड़ा
13 फरवरी 1916 को झेलम की काला गुजरान जिले में लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा का जन्म हुआ था। यह जगह आजादी के बाद पाकिस्तान में चली गई थी।
मई 2005 में उनका निधन हो गया लेकिन आज भी लोग उन्हें याद करते हैं और यही कहते हैं, 'वह बांग्लादेश वाले अरोड़ा।' जनरल अरोड़ा आज भी कई युवाओं के आदर्श हैं।
71 की लड़ाई में मिली जीत के बाद भी उन्हें उस समय की इंदिरा गांधी सरकार से नजरअंदाजगी झेलनी पड़ी थी। इसके बाद भी उन्होंने कभी न तो सेना और न ही कभी अपने देश मुंह मोड़ा।
हमेशा युवाओं को सेना में जाने और देश सेवा के लिए प्रेरित करते रहते और आखिरी दम तक लोगों के हीरो रहे।
'सरकारें भूली लेकिन जनता को आज तक याद'
एक बार उनकी कार ने एक मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी। इसके बाद वह कार से उतरें और उन्होंने कहा, 'मैं जगजीत सिंह अरोड़ा हूं। आप मेरे घर आकर रिपेयर चार्ज कलेक्ट कर सकते हैं।' इस पर भीड़ से आवाज आई, 'वहीं बांग्लादेश वाले।' इसके बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि सरकारें हमें भूल जाती हैं लेकिन लोग हमें आज तक याद रखते हैं।
पंजाब रेजीमेंट का हिस्सा और वर्ल्ड वॉर टू के गवाह
लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सन 1939 में इंडियन मिलिट्री अकेडमी से ग्रुजेएट हुए थे। इसके बाद वह दूसरी पंजाब रेजीमेंट की पहली बटालियन में कमीशंड ऑफिसर बने। लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ने बर्मा गए जहां पर वह दूसरे विश्व युद्ध का भी हिस्सा बने।
62 और 65 की लड़ाई का रहे हिस्सा
वर्ष 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो उस समय लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ऑफिसर बन चुके थे और इस दौरान उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच पहले युद्ध को करीब से देखा। इसके बाद 62 में चीन के साथ हुई लड़ाई के समय तक वह ब्रिगेडियर बन चुके थे। फिर 65 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई में भी वह शामिल रहे।
जनरल अरोड़ा कर रहे थे मुक्ति बाहिनी और इंडियन आर्मी को लीड
16 दिसंबर 1971 को इंडियन आर्मी और बांग्लादेश की मुक्ति बाहिनी को लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ही लीड कर रहे थे। यह वह दिन था जब पाकिस्तान की सेना के आफिसर जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी को अपने 93,000 सैनिकों के साथ भारत से मिली हार के बाद आखिर में सरेंडर करना पड़ा था।
इंदिरा गांधी ने किया था निराश
जीत के बाद पहले 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल इंदिरा गांधी सरकार के रवैये से खफा थे। इसके बाद फिर नवंबर 84 में जब दंगे भड़के तो सरकार के साथ उनकी कड़वाहट और बढ़ गई थी।
परम विशिष्ट सेवा मेडल का भी सम्मान
वर्ष 1973 में लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सेना से रिटायर हो गए। उन्हें पहले परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद युद्ध में उनकी भूमिका की वजह से उन्हें पदम भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। कई लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें सेना प्रमुख भी बनाया जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका था।
3rd May / Death anniversary - Jagger Singh Arora
Lieutenant General Arora was born on 13 February 1916 in Kala Gujran district of Jhelum. This place moved to Pakistan after independence.
He died in May 2005, but still remembers him and says, "Aurora of Bangladesh." General Arora is the ideal of many youth even today.
Even after the victory in the battle of 71, he had to ignore the Indira Gandhi government of that time. Even after this, he never turned his face to the army nor his country.
Always motivated the youth to enter the army and serve the country and till the end they were the heroes of the people.
'Governments forgot but public remember till date'
Once his car hit a motorcycle. He then got down from the car and he said, 'I am Jagjit Singh Arora. You can come to my house and collect the repair charge. A voice came from the crowd, "Bangladesh people there." After this, he had said in an interview that governments forget us but people still remember us till today.
Part of Punjab Regiment and witness to World War Two
Lieutenant General Arora graduated from the Indian Military Academy in 1939. He then became a commissioned officer in the 1st Battalion of the 2nd Punjab Regiment. Lieutenant General Arora went to Burma where he also became part of the Second World War.
Part of the battle of 62 and 65
When the country was divided in 1947, Lt Gen Arora had become an officer at that time and during this time he closely watched the first war between India and Pakistan. After this, by the time of the fight with China in 62, he had become a brigadier. He was also involved in the war with Pakistan in 65 years.
General Arora was leading Mukti Bahini and Indian Army
On 16 December 1971, the Indian Army and Bangladesh's Mukti Bahini were led by Lieutenant General Jagjit Singh Arora. It was the day that Pakistan's Army General, Amir Abdullah Khan Niazi, with his 93,000 soldiers, finally had to surrender after the defeat of India.
Indira Gandhi was disappointed
Lt. General Indira Gandhi was upset with the government's attitude during the first 'Operation Bluestar' after the victory. After this, when the riots broke out in November 84, his bitterness with the government increased.
Param Vishisht Seva Medal also honored
In 1973, Lieutenant General Arora retired from the army. He was awarded the first Param Vishisht Seva Medal. He was then awarded the Padma Bhushan due to his role in the war. Many hoped that he would also be made the army chief but this could not happen.
3 مئی / برسی - جیگر سنگھ اروڑا
لیفٹیننٹ جنرل اروڑا 13 فروری 1916 کو جہلم کے ضلع کالا گوجران میں پیدا ہوئے تھے۔ یہ جگہ آزادی کے بعد پاکستان منتقل ہوگئی۔
ان کا انتقال مئی 2005 میں ہوا ، لیکن پھر بھی انہیں یاد ہے اور کہتے ہیں ، "بنگلہ دیش کا ارورہ۔" جنرل اروڑا آج بھی بہت سارے نوجوانوں کا آئیڈیل ہیں۔
71 کی جنگ میں فتح کے بعد بھی ، انہیں اس وقت کی اندرا گاندھی حکومت کو نظر انداز کرنا پڑا۔ اس کے بعد بھی ، اس نے کبھی بھی فوج اور نہ ہی اپنے ملک کی طرف منہ کیا۔
جوانوں کو ہمیشہ فوج میں داخل ہونے اور ملک کی خدمت کی ترغیب دی اور آخر تک وہ عوام کے ہیرو رہے۔
'حکومتیں تو بھول گئیں لیکن عوام آج تک یاد ہیں'
ایک بار اس کی کار موٹرسائیکل سے ٹکرا گئی۔ اس کے بعد وہ کار سے نیچے اترے اور انہوں نے کہا ، 'میں جگجیت سنگھ اروڑا ہوں۔ آپ میرے گھر آکر مرمت کا چارج اکٹھا کرسکتے ہیں۔ مجمع سے آواز آئی ، "بنگلہ دیش کے لوگ وہاں موجود ہیں۔" اس کے بعد ، انہوں نے ایک انٹرویو میں کہا تھا کہ حکومتیں ہمیں بھول جاتی ہیں لیکن لوگ آج تک ہمیں یاد کرتے ہیں۔
پنجاب رجمنٹ کا حصہ اور دوسری جنگ عظیم کا گواہ ہے
لیفٹیننٹ جنرل اروڑا نے 1939 میں ہندوستانی ملٹری اکیڈمی سے گریجویشن کیا تھا۔ اس کے بعد وہ دوسری پنجاب رجمنٹ کی پہلی بٹالین میں کمیشنڈ آفیسر بن گئے۔ لیفٹیننٹ جنرل اروڑا برما گئے جہاں وہ دوسری جنگ عظیم کا بھی حصہ بن گئے۔
62 اور 65 کی جنگ کا حصہ
جب 1947 میں ملک تقسیم ہوا تو لیفٹیننٹ جنرل اروڑا اس وقت افسر بن چکے تھے اور اس دوران انہوں نے ہندوستان اور پاکستان کے مابین پہلی جنگ کو قریب سے دیکھا۔ اس کے بعد ، 62 میں چین کے ساتھ لڑائی کے وقت تک ، وہ ایک بریگیڈیئر بن گیا تھا۔ وہ 65 سالوں میں پاکستان کے ساتھ جنگ میں بھی شامل تھا۔
جنرل اروڑا مکتی باہنی اور ہندوستانی فوج کی قیادت کررہے تھے
16 دسمبر 1971 کو ، ہندوستانی فوج اور بنگلہ دیش کی مکتی باہنی کی قیادت لیفٹیننٹ جنرل جگجیت سنگھ اروڑا نے کی۔ وہ دن تھا جب پاکستان کے آرمی جنرل ، امیر عبد اللہ خان نیازی کو ، اپنے 93،000 فوجیوں کے ساتھ ، آخر کار ہندوستان کی شکست کے بعد ہتھیار ڈالنا پڑے۔
اندرا گاندھی مایوس ہوئیں
لیفٹیننٹ جنرل اندرا گاندھی فتح کے بعد پہلے 'آپریشن بلوسٹار' کے دوران حکومت کے رویہ سے ناراض تھیں۔ اس کے بعد ، نومبر in 84 میں جب ہنگامے پھوٹ پڑے تو حکومت سے اس کی تلخی بڑھ گئی۔
پرم ویشت سیوا میڈل سے بھی نوازا گیا
1973 میں ، لیفٹیننٹ جنرل اروڑا فوج سے ریٹائر ہوئے۔ اوہناں نوں پہلا پیرم ویشیت خدمت میڈل دیا گیا۔ اس کے بعد انہیں جنگ میں اپنے کردار کی وجہ سے پدم بھوشن سے نوازا گیا۔ بہت سے لوگوں کو امید تھی کہ انہیں بھی آرمی چیف بنایا جائے گا لیکن ایسا نہیں ہوسکا۔
13 फरवरी 1916 को झेलम की काला गुजरान जिले में लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा का जन्म हुआ था। यह जगह आजादी के बाद पाकिस्तान में चली गई थी।
मई 2005 में उनका निधन हो गया लेकिन आज भी लोग उन्हें याद करते हैं और यही कहते हैं, 'वह बांग्लादेश वाले अरोड़ा।' जनरल अरोड़ा आज भी कई युवाओं के आदर्श हैं।
71 की लड़ाई में मिली जीत के बाद भी उन्हें उस समय की इंदिरा गांधी सरकार से नजरअंदाजगी झेलनी पड़ी थी। इसके बाद भी उन्होंने कभी न तो सेना और न ही कभी अपने देश मुंह मोड़ा।
हमेशा युवाओं को सेना में जाने और देश सेवा के लिए प्रेरित करते रहते और आखिरी दम तक लोगों के हीरो रहे।
'सरकारें भूली लेकिन जनता को आज तक याद'
एक बार उनकी कार ने एक मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी। इसके बाद वह कार से उतरें और उन्होंने कहा, 'मैं जगजीत सिंह अरोड़ा हूं। आप मेरे घर आकर रिपेयर चार्ज कलेक्ट कर सकते हैं।' इस पर भीड़ से आवाज आई, 'वहीं बांग्लादेश वाले।' इसके बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि सरकारें हमें भूल जाती हैं लेकिन लोग हमें आज तक याद रखते हैं।
पंजाब रेजीमेंट का हिस्सा और वर्ल्ड वॉर टू के गवाह
लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सन 1939 में इंडियन मिलिट्री अकेडमी से ग्रुजेएट हुए थे। इसके बाद वह दूसरी पंजाब रेजीमेंट की पहली बटालियन में कमीशंड ऑफिसर बने। लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ने बर्मा गए जहां पर वह दूसरे विश्व युद्ध का भी हिस्सा बने।
62 और 65 की लड़ाई का रहे हिस्सा
वर्ष 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो उस समय लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ऑफिसर बन चुके थे और इस दौरान उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच पहले युद्ध को करीब से देखा। इसके बाद 62 में चीन के साथ हुई लड़ाई के समय तक वह ब्रिगेडियर बन चुके थे। फिर 65 में पाकिस्तान के साथ लड़ाई में भी वह शामिल रहे।
जनरल अरोड़ा कर रहे थे मुक्ति बाहिनी और इंडियन आर्मी को लीड
16 दिसंबर 1971 को इंडियन आर्मी और बांग्लादेश की मुक्ति बाहिनी को लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ही लीड कर रहे थे। यह वह दिन था जब पाकिस्तान की सेना के आफिसर जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी को अपने 93,000 सैनिकों के साथ भारत से मिली हार के बाद आखिर में सरेंडर करना पड़ा था।
इंदिरा गांधी ने किया था निराश
जीत के बाद पहले 'ऑपरेशन ब्लूस्टार' के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल इंदिरा गांधी सरकार के रवैये से खफा थे। इसके बाद फिर नवंबर 84 में जब दंगे भड़के तो सरकार के साथ उनकी कड़वाहट और बढ़ गई थी।
परम विशिष्ट सेवा मेडल का भी सम्मान
वर्ष 1973 में लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सेना से रिटायर हो गए। उन्हें पहले परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद युद्ध में उनकी भूमिका की वजह से उन्हें पदम भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। कई लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें सेना प्रमुख भी बनाया जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका था।
3rd May / Death anniversary - Jagger Singh Arora
Lieutenant General Arora was born on 13 February 1916 in Kala Gujran district of Jhelum. This place moved to Pakistan after independence.
He died in May 2005, but still remembers him and says, "Aurora of Bangladesh." General Arora is the ideal of many youth even today.
Even after the victory in the battle of 71, he had to ignore the Indira Gandhi government of that time. Even after this, he never turned his face to the army nor his country.
Always motivated the youth to enter the army and serve the country and till the end they were the heroes of the people.
'Governments forgot but public remember till date'
Once his car hit a motorcycle. He then got down from the car and he said, 'I am Jagjit Singh Arora. You can come to my house and collect the repair charge. A voice came from the crowd, "Bangladesh people there." After this, he had said in an interview that governments forget us but people still remember us till today.
Part of Punjab Regiment and witness to World War Two
Lieutenant General Arora graduated from the Indian Military Academy in 1939. He then became a commissioned officer in the 1st Battalion of the 2nd Punjab Regiment. Lieutenant General Arora went to Burma where he also became part of the Second World War.
Part of the battle of 62 and 65
When the country was divided in 1947, Lt Gen Arora had become an officer at that time and during this time he closely watched the first war between India and Pakistan. After this, by the time of the fight with China in 62, he had become a brigadier. He was also involved in the war with Pakistan in 65 years.
General Arora was leading Mukti Bahini and Indian Army
On 16 December 1971, the Indian Army and Bangladesh's Mukti Bahini were led by Lieutenant General Jagjit Singh Arora. It was the day that Pakistan's Army General, Amir Abdullah Khan Niazi, with his 93,000 soldiers, finally had to surrender after the defeat of India.
Indira Gandhi was disappointed
Lt. General Indira Gandhi was upset with the government's attitude during the first 'Operation Bluestar' after the victory. After this, when the riots broke out in November 84, his bitterness with the government increased.
Param Vishisht Seva Medal also honored
In 1973, Lieutenant General Arora retired from the army. He was awarded the first Param Vishisht Seva Medal. He was then awarded the Padma Bhushan due to his role in the war. Many hoped that he would also be made the army chief but this could not happen.
3 مئی / برسی - جیگر سنگھ اروڑا
لیفٹیننٹ جنرل اروڑا 13 فروری 1916 کو جہلم کے ضلع کالا گوجران میں پیدا ہوئے تھے۔ یہ جگہ آزادی کے بعد پاکستان منتقل ہوگئی۔
ان کا انتقال مئی 2005 میں ہوا ، لیکن پھر بھی انہیں یاد ہے اور کہتے ہیں ، "بنگلہ دیش کا ارورہ۔" جنرل اروڑا آج بھی بہت سارے نوجوانوں کا آئیڈیل ہیں۔
71 کی جنگ میں فتح کے بعد بھی ، انہیں اس وقت کی اندرا گاندھی حکومت کو نظر انداز کرنا پڑا۔ اس کے بعد بھی ، اس نے کبھی بھی فوج اور نہ ہی اپنے ملک کی طرف منہ کیا۔
جوانوں کو ہمیشہ فوج میں داخل ہونے اور ملک کی خدمت کی ترغیب دی اور آخر تک وہ عوام کے ہیرو رہے۔
'حکومتیں تو بھول گئیں لیکن عوام آج تک یاد ہیں'
ایک بار اس کی کار موٹرسائیکل سے ٹکرا گئی۔ اس کے بعد وہ کار سے نیچے اترے اور انہوں نے کہا ، 'میں جگجیت سنگھ اروڑا ہوں۔ آپ میرے گھر آکر مرمت کا چارج اکٹھا کرسکتے ہیں۔ مجمع سے آواز آئی ، "بنگلہ دیش کے لوگ وہاں موجود ہیں۔" اس کے بعد ، انہوں نے ایک انٹرویو میں کہا تھا کہ حکومتیں ہمیں بھول جاتی ہیں لیکن لوگ آج تک ہمیں یاد کرتے ہیں۔
پنجاب رجمنٹ کا حصہ اور دوسری جنگ عظیم کا گواہ ہے
لیفٹیننٹ جنرل اروڑا نے 1939 میں ہندوستانی ملٹری اکیڈمی سے گریجویشن کیا تھا۔ اس کے بعد وہ دوسری پنجاب رجمنٹ کی پہلی بٹالین میں کمیشنڈ آفیسر بن گئے۔ لیفٹیننٹ جنرل اروڑا برما گئے جہاں وہ دوسری جنگ عظیم کا بھی حصہ بن گئے۔
62 اور 65 کی جنگ کا حصہ
جب 1947 میں ملک تقسیم ہوا تو لیفٹیننٹ جنرل اروڑا اس وقت افسر بن چکے تھے اور اس دوران انہوں نے ہندوستان اور پاکستان کے مابین پہلی جنگ کو قریب سے دیکھا۔ اس کے بعد ، 62 میں چین کے ساتھ لڑائی کے وقت تک ، وہ ایک بریگیڈیئر بن گیا تھا۔ وہ 65 سالوں میں پاکستان کے ساتھ جنگ میں بھی شامل تھا۔
جنرل اروڑا مکتی باہنی اور ہندوستانی فوج کی قیادت کررہے تھے
16 دسمبر 1971 کو ، ہندوستانی فوج اور بنگلہ دیش کی مکتی باہنی کی قیادت لیفٹیننٹ جنرل جگجیت سنگھ اروڑا نے کی۔ وہ دن تھا جب پاکستان کے آرمی جنرل ، امیر عبد اللہ خان نیازی کو ، اپنے 93،000 فوجیوں کے ساتھ ، آخر کار ہندوستان کی شکست کے بعد ہتھیار ڈالنا پڑے۔
اندرا گاندھی مایوس ہوئیں
لیفٹیننٹ جنرل اندرا گاندھی فتح کے بعد پہلے 'آپریشن بلوسٹار' کے دوران حکومت کے رویہ سے ناراض تھیں۔ اس کے بعد ، نومبر in 84 میں جب ہنگامے پھوٹ پڑے تو حکومت سے اس کی تلخی بڑھ گئی۔
پرم ویشت سیوا میڈل سے بھی نوازا گیا
1973 میں ، لیفٹیننٹ جنرل اروڑا فوج سے ریٹائر ہوئے۔ اوہناں نوں پہلا پیرم ویشیت خدمت میڈل دیا گیا۔ اس کے بعد انہیں جنگ میں اپنے کردار کی وجہ سے پدم بھوشن سے نوازا گیا۔ بہت سے لوگوں کو امید تھی کہ انہیں بھی آرمی چیف بنایا جائے گا لیکن ایسا نہیں ہوسکا۔


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