27 April / Historical Remembrance - Fall of Kangla Fort
27 अप्रैल/इतिहासस्मृति - कांगला दुर्ग का पतन
1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ भी कहते हैं।
उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1856 को हुआ था। वे राजा चन्द्रकीर्ति के चौथे पुत्र थे। राजा की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र सूरचन्द्र राजा बने। दूसरे और तीसरे पुत्रों को क्रमशः पुलिस प्रमुख तथा सेनापति बनाया गया। कुछ समय बाद सेनापति झलकीर्ति की मृत्यु हो जाने से टिकेन्द्रजीत सिंह सेनापति बनाये गये।
राजवंशों में आपसी द्वेष व अहंकार के कारण सदा से ही गुटबाजी होती रही है। मणिपुर में भी ऐसा ही हुआ। अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाना चाहा। टिकेन्द्रजीत सिंह ने राजा सूरचन्द्र को कई बार सावधान किया; पर वे उदासीन रहे। इससे नाराज होकर टिकेन्द्रजीत सिंह ने अंगसेन, जिलंगाम्बा आदि कई वीर व स्वदेशप्रेमी साथियों सहित 22 सितम्बर, 1890 को विद्रोह कर दिया।
इस विद्रोह से डरकर राजा भाग गया। अब कुलचन्द्र को राजा तथा टिकेन्द्रजीत सिंह को युवराज व सेनापति बनाया गया। पूर्व राजा सूरचन्द्र ने टिकेन्द्रजीत सिंह को सूचना दी कि वे राज्य छोड़कर सदा के लिए वृन्दावन जाना चाहते हैं; पर वे वृन्दावन की बजाय कलकत्ता में ब्रिटिश वायसराय लैंसडाउन के पास पहुंच गये और अपना राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की।
इस पर वायसराय ने असम के कमिश्नर जे.डब्ल्यू. क्विंटन को मणिपुर पर हमला करने को कहा। उनकी इच्छा टिकेन्द्रजीत सिंह को पकड़ने की थी। चूंकि इस शासन के निर्माता तथा संरक्षक वही थे। क्विंटन 22 मार्च, 1891 को 400 सैनिकों के साथ मणिपुर जा पहुंचा। इस दल का नेतृत्व कर्नल स्कैन कर रहा था। उसने राजा कुलचंद्र को कहा कि हमें आपसे कोई परेशानी नहीं है। आप स्वतंत्रतापूर्वक राज्य करें; पर युवराज टिकेन्द्रजीत सिंह को हमें सौंप दें।
पर स्वाभिमानी राजा तैयार नहीं हुए। अंततः क्विंटन ने 24 मार्च को राजनिवास ‘कांगला दुर्ग’ पर हमला बोल दिया। उस समय दुर्ग में रासलीला का प्रदर्शन हो रहा था। लोग दत्तचित्त होकर उसे देख रहे थे।इस असावधान अवस्था में ही क्विंटन ने सैकड़ों पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों को मार डाला; पर थोड़ी देर में ही दुर्ग में स्थित सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया। इससे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। क्रोधित नागरिकों ने पांच अंग्रेज अधिकारियों को पकड़कर फांसी दे दी। इनमें क्विंटन तथा उनका राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड भी था।
अंग्रेज सेना की इस पराजय की सूचना मिलते ही कोहिमा, सिलचर और तामू से तीन बड़ी सैनिक टुकडि़यां भेज दी गयीं। 31 मार्च, 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर शासन से युद्ध घोषित कर दिया। टिकेन्द्रजीत सिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज सेना का मुकाबला किया; पर उनके साधन सीमित थे। अंततः 27 अप्रैल, 1891 को अंग्रेज सेना ने कांगला दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
अंग्रेजों ने राजवंश के एक बालक चारुचंद्र सिंह को राजा तथा मेजर मैक्सवेल को उनका राजनीतिकत सलाहकार बनाकर मणिपुर को अपने अधीन कर लिया। टिकेन्द्रजीत सिंह भूमिगत हो गये; पर अंततः 23 मई को वे भी पकड़ लिये गये। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर उन्हें और उनके साथी जनरल थंगल को 13 अगस्त, 1891 को इम्फाल के पोलो मैदान (वर्तमान वीर टिकेन्द्रजीत सिंह मैदान) में फांसी दे दी।
27 April / Historical Remembrance - Fall of Kangla Fort
After the success of the freedom struggle of 1857, the British also tried to subdue areas which were not under their occupation. Manipur was one such region in northeast India. The freedom lover Veer Tikendrajit Singh was the crown prince and general. He is also called the 'Lion of Manipur'.
He was born on December 29, 1856. He was the fourth son of King Chandrakirti. After the death of the king, his elder son Surchandra became the king. The second and third sons were made police chiefs and commanders respectively. After some time, Tikendrajit Singh was made the commander after the death of the commander Jhalakirti.
There has always been factionalism among dynasties due to mutual hatred and arrogance. The same happened in Manipur. The British wanted to take advantage of this situation. Tikendrajit Singh cautioned King Surchandra several times; But they remained indifferent. Angered by this, Tikendrajit Singh revolted on 22 September 1890, along with many brave and foreign-born companions like Angasen, Jilangamba.
Fearing this rebellion, the king fled. Now Kulchandra was made the king and Tikendrajit Singh was made the crown prince and commander. Former king Surchandra informed Tikendrajit Singh that he wanted to leave the kingdom and go to Vrindavan forever; But instead of Vrindavan, he reached the British Viceroy Lansdowne in Calcutta and prayed to get his kingdom back.
The Viceroy, on this, commissioner of Assam J.W. Asked Quinton to attack Manipur. He wished to capture Tikendrajit Singh. Since he was the creator and mentor of this rule. Quinton arrived in Manipur on March 22, 1891 with 400 soldiers. The leadership of this team was scanning the colonel. He told King Kulchandra that we have no problem with you. You should rule freely; But hand us the crown prince Tikendrajit Singh.
But the proud king was not ready. Quinton eventually attacked Rajnivas 'Kangla Durg' on 24 March. Raslila was being performed in the fort at that time. People were anxious and watching him. Quintan killed hundreds of men, women and children in this heedless state; But within a short time, the army located in the fort also took over. This led the British to retreat. Angry citizens caught and hanged five British officers. Quinton and his political agent were also Grimwood.
As soon as the British army received information about this defeat, three large troops were sent from Kohima, Silchar and Tamu. On 31 March 1891, the British declared war against the Manipur regime. Tikendrajit Singh fought the British army with great valor; But their means were limited. Finally, on 27 April 1891, the British army captured the Kangla fort.
The British took Manipur under Charuchandra Singh, a child of the dynasty, Raja and Major Maxwell as their political advisors. Tikendrajit Singh went underground; But eventually they were caught on 23 May. The British prosecuted and hanged him and his fellow general Thangal on 13 August 1891 at the Polo Maidan in Imphal (present-day Vir Tikendrajit Singh Maidan).
27 اپریل / تاریخی یادگاری۔ کنگلا قلعہ کا زوال
1857 کی جدوجہد آزادی کی کامیابی کے بعد ، انگریزوں نے ان علاقوں کو بھی زیر کرنے کی کوشش کی جو ان کے زیر قبضہ نہیں تھے۔ منی پور شمال مشرقی ہندوستان میں ایک ایسا ہی خطہ تھا۔ آزادی پسند عاشق ویر ٹیکندرجیت سنگھ ولی عہد شہزادہ اور جنرل تھے۔ اسے 'منی پور کا شیر' بھی کہا جاتا ہے۔
وہ 29 دسمبر ، 1856 کو پیدا ہوا تھا۔ وہ شاہ چندرکیرتی کا چوتھا بیٹا تھا۔ بادشاہ کی موت کے بعد ، اس کا بڑا بیٹا سرچندرا بادشاہ بنا۔ دوسرے اور تیسرے بیٹے کو بالترتیب پولیس چیف اور کمانڈر بنایا گیا۔ کچھ عرصے کے بعد ، کمانڈر جھلاکیرتی کی موت کے بعد ٹکیندرجیت سنگھ کو کمانڈر بنایا گیا۔
باہمی منافرت اور تکبر کی وجہ سے ہمیشہ ہی خاندانوں میں دھڑے بندی رہی ہے۔ منی پور میں بھی ایسا ہی ہوا تھا۔ انگریز اس صورتحال سے فائدہ اٹھانا چاہتے تھے۔ ٹکندرجیت سنگھ نے کئی بار بادشاہ سورچندر کو متنبہ کیا۔ لیکن وہ لاتعلق رہے۔ اس سے ناراض ہو کر ، تیکنجیت سنگھ نے 22 ستمبر 1890 کو انگاسین ، جیلنگبہ جیسے بہت سے بہادر اور غیر ملکی نژاد ساتھیوں کے ساتھ بغاوت کی۔
اس سرکشی کے خوف سے ، بادشاہ فرار ہوگیا۔ اب کل چندر کو بادشاہ بنا دیا گیا تھا اور ٹیکندرجیت سنگھ کو ولی عہد شہزادہ اور کمانڈر بنایا گیا تھا۔ سابق بادشاہ سر چندر نے ٹکیندرجیت سنگھ کو مطلع کیا کہ وہ بادشاہت چھوڑ کر ہمیشہ کے لئے ورینداون جانا چاہتے ہیں۔ لیکن ورینداون کی بجائے ، وہ کلکتہ میں برطانوی وائسرائے لانس ڈاون پہنچے اور اپنی بادشاہی کو واپس حاصل کرنے کے لئے دعا کی۔
وائسرائے ، اس پر ، آسام کے کمشنر J.W. کوئنٹن سے مانی پور پر حملہ کرنے کو کہا۔ اس نے تکیندرجیت سنگھ کو پکڑنے کی خواہش کی۔ چونکہ وہ اس اصول کے تخلیق کار اور سرپرست تھے۔ کلنٹن 400 فوجیوں کے ساتھ 22 مارچ 1891 کو منی پور پہنچا۔ اس ٹیم کی قیادت کرنل کو اسکین کررہی تھی۔ اس نے شاہ کلچندرا سے کہا کہ ہمیں آپ سے کوئی مسئلہ نہیں ہے۔ آپ آزادانہ طور پر حکمرانی کریں۔ لیکن ہمیں ولی عہد شہزادہ ٹیکندرجیت سنگھ کے حوالے کریں۔
لیکن مغرور بادشاہ تیار نہیں تھا۔ بالآخر 24 مارچ کو کوئنٹن نے راجنیواس 'کنگلا درگ' پر حملہ کیا۔ اس وقت قلعے میں رسیلیہ ادا کی جارہی تھی۔ لوگ بے چین تھے اور اسے دیکھ رہے تھے۔کوئنٹن نے اس غافل حالت میں سیکڑوں مرد ، خواتین اور بچوں کو ہلاک کیا۔ لیکن قلیل ہی میں قلعہ میں واقع فوج نے بھی اقتدار سنبھال لیا۔ اس سے انگریز پیچھے ہٹ گئے۔ مشتعل شہریوں نے پانچ برطانوی افسروں کو پکڑ کر پھانسی دے دی۔ کلنٹن اور ان کے پولیٹیکل ایجنٹ بھی گرم ووڈ تھے۔
جیسے ہی برطانوی فوج کو اس شکست کے بارے میں اطلاع ملی ، کوہیما ، سلچار اور تامو سے تین بڑی فوج بھیج دی گئی۔ 31 مارچ 1891 کو انگریزوں نے منی پور حکومت کے خلاف جنگ کا اعلان کیا۔ ٹکندرجیت سنگھ نے بڑی طاقت کے ساتھ برطانوی فوج کا مقابلہ کیا۔ لیکن ان کے ذرائع محدود تھے۔ آخر کار ، 27 اپریل 1891 کو ، برطانوی فوج نے کنگلا قلعہ پر قبضہ کرلیا۔
انگریزوں نے مانی پور کو خاندان کے ایک بچے چاروچندر سنگھ ، راجہ اور میجر میکسویل کے تحت اپنا سیاسی مشیر بنا لیا۔ ٹکندرجیت سنگھ زیر زمین چلا گیا۔ لیکن آخر کار وہ 23 مئی کو پکڑے گئے۔ انگریز نے انفال (موجودہ ویر ٹیکندرجیت سنگھ میدان) کے پولو میدان میں 13 اگست 1891 کو اس کو اور اس کے ساتھی جنرل تھانگل کو مقدمہ چلایا اور اسے پھانسی دے دی۔
1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ भी कहते हैं।
उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1856 को हुआ था। वे राजा चन्द्रकीर्ति के चौथे पुत्र थे। राजा की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र सूरचन्द्र राजा बने। दूसरे और तीसरे पुत्रों को क्रमशः पुलिस प्रमुख तथा सेनापति बनाया गया। कुछ समय बाद सेनापति झलकीर्ति की मृत्यु हो जाने से टिकेन्द्रजीत सिंह सेनापति बनाये गये।
राजवंशों में आपसी द्वेष व अहंकार के कारण सदा से ही गुटबाजी होती रही है। मणिपुर में भी ऐसा ही हुआ। अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाना चाहा। टिकेन्द्रजीत सिंह ने राजा सूरचन्द्र को कई बार सावधान किया; पर वे उदासीन रहे। इससे नाराज होकर टिकेन्द्रजीत सिंह ने अंगसेन, जिलंगाम्बा आदि कई वीर व स्वदेशप्रेमी साथियों सहित 22 सितम्बर, 1890 को विद्रोह कर दिया।
इस विद्रोह से डरकर राजा भाग गया। अब कुलचन्द्र को राजा तथा टिकेन्द्रजीत सिंह को युवराज व सेनापति बनाया गया। पूर्व राजा सूरचन्द्र ने टिकेन्द्रजीत सिंह को सूचना दी कि वे राज्य छोड़कर सदा के लिए वृन्दावन जाना चाहते हैं; पर वे वृन्दावन की बजाय कलकत्ता में ब्रिटिश वायसराय लैंसडाउन के पास पहुंच गये और अपना राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की।
इस पर वायसराय ने असम के कमिश्नर जे.डब्ल्यू. क्विंटन को मणिपुर पर हमला करने को कहा। उनकी इच्छा टिकेन्द्रजीत सिंह को पकड़ने की थी। चूंकि इस शासन के निर्माता तथा संरक्षक वही थे। क्विंटन 22 मार्च, 1891 को 400 सैनिकों के साथ मणिपुर जा पहुंचा। इस दल का नेतृत्व कर्नल स्कैन कर रहा था। उसने राजा कुलचंद्र को कहा कि हमें आपसे कोई परेशानी नहीं है। आप स्वतंत्रतापूर्वक राज्य करें; पर युवराज टिकेन्द्रजीत सिंह को हमें सौंप दें।
पर स्वाभिमानी राजा तैयार नहीं हुए। अंततः क्विंटन ने 24 मार्च को राजनिवास ‘कांगला दुर्ग’ पर हमला बोल दिया। उस समय दुर्ग में रासलीला का प्रदर्शन हो रहा था। लोग दत्तचित्त होकर उसे देख रहे थे।इस असावधान अवस्था में ही क्विंटन ने सैकड़ों पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों को मार डाला; पर थोड़ी देर में ही दुर्ग में स्थित सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया। इससे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। क्रोधित नागरिकों ने पांच अंग्रेज अधिकारियों को पकड़कर फांसी दे दी। इनमें क्विंटन तथा उनका राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड भी था।
अंग्रेज सेना की इस पराजय की सूचना मिलते ही कोहिमा, सिलचर और तामू से तीन बड़ी सैनिक टुकडि़यां भेज दी गयीं। 31 मार्च, 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर शासन से युद्ध घोषित कर दिया। टिकेन्द्रजीत सिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज सेना का मुकाबला किया; पर उनके साधन सीमित थे। अंततः 27 अप्रैल, 1891 को अंग्रेज सेना ने कांगला दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
अंग्रेजों ने राजवंश के एक बालक चारुचंद्र सिंह को राजा तथा मेजर मैक्सवेल को उनका राजनीतिकत सलाहकार बनाकर मणिपुर को अपने अधीन कर लिया। टिकेन्द्रजीत सिंह भूमिगत हो गये; पर अंततः 23 मई को वे भी पकड़ लिये गये। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर उन्हें और उनके साथी जनरल थंगल को 13 अगस्त, 1891 को इम्फाल के पोलो मैदान (वर्तमान वीर टिकेन्द्रजीत सिंह मैदान) में फांसी दे दी।
27 April / Historical Remembrance - Fall of Kangla Fort
After the success of the freedom struggle of 1857, the British also tried to subdue areas which were not under their occupation. Manipur was one such region in northeast India. The freedom lover Veer Tikendrajit Singh was the crown prince and general. He is also called the 'Lion of Manipur'.
He was born on December 29, 1856. He was the fourth son of King Chandrakirti. After the death of the king, his elder son Surchandra became the king. The second and third sons were made police chiefs and commanders respectively. After some time, Tikendrajit Singh was made the commander after the death of the commander Jhalakirti.
There has always been factionalism among dynasties due to mutual hatred and arrogance. The same happened in Manipur. The British wanted to take advantage of this situation. Tikendrajit Singh cautioned King Surchandra several times; But they remained indifferent. Angered by this, Tikendrajit Singh revolted on 22 September 1890, along with many brave and foreign-born companions like Angasen, Jilangamba.
Fearing this rebellion, the king fled. Now Kulchandra was made the king and Tikendrajit Singh was made the crown prince and commander. Former king Surchandra informed Tikendrajit Singh that he wanted to leave the kingdom and go to Vrindavan forever; But instead of Vrindavan, he reached the British Viceroy Lansdowne in Calcutta and prayed to get his kingdom back.
The Viceroy, on this, commissioner of Assam J.W. Asked Quinton to attack Manipur. He wished to capture Tikendrajit Singh. Since he was the creator and mentor of this rule. Quinton arrived in Manipur on March 22, 1891 with 400 soldiers. The leadership of this team was scanning the colonel. He told King Kulchandra that we have no problem with you. You should rule freely; But hand us the crown prince Tikendrajit Singh.
But the proud king was not ready. Quinton eventually attacked Rajnivas 'Kangla Durg' on 24 March. Raslila was being performed in the fort at that time. People were anxious and watching him. Quintan killed hundreds of men, women and children in this heedless state; But within a short time, the army located in the fort also took over. This led the British to retreat. Angry citizens caught and hanged five British officers. Quinton and his political agent were also Grimwood.
As soon as the British army received information about this defeat, three large troops were sent from Kohima, Silchar and Tamu. On 31 March 1891, the British declared war against the Manipur regime. Tikendrajit Singh fought the British army with great valor; But their means were limited. Finally, on 27 April 1891, the British army captured the Kangla fort.
The British took Manipur under Charuchandra Singh, a child of the dynasty, Raja and Major Maxwell as their political advisors. Tikendrajit Singh went underground; But eventually they were caught on 23 May. The British prosecuted and hanged him and his fellow general Thangal on 13 August 1891 at the Polo Maidan in Imphal (present-day Vir Tikendrajit Singh Maidan).
27 اپریل / تاریخی یادگاری۔ کنگلا قلعہ کا زوال
1857 کی جدوجہد آزادی کی کامیابی کے بعد ، انگریزوں نے ان علاقوں کو بھی زیر کرنے کی کوشش کی جو ان کے زیر قبضہ نہیں تھے۔ منی پور شمال مشرقی ہندوستان میں ایک ایسا ہی خطہ تھا۔ آزادی پسند عاشق ویر ٹیکندرجیت سنگھ ولی عہد شہزادہ اور جنرل تھے۔ اسے 'منی پور کا شیر' بھی کہا جاتا ہے۔
وہ 29 دسمبر ، 1856 کو پیدا ہوا تھا۔ وہ شاہ چندرکیرتی کا چوتھا بیٹا تھا۔ بادشاہ کی موت کے بعد ، اس کا بڑا بیٹا سرچندرا بادشاہ بنا۔ دوسرے اور تیسرے بیٹے کو بالترتیب پولیس چیف اور کمانڈر بنایا گیا۔ کچھ عرصے کے بعد ، کمانڈر جھلاکیرتی کی موت کے بعد ٹکیندرجیت سنگھ کو کمانڈر بنایا گیا۔
باہمی منافرت اور تکبر کی وجہ سے ہمیشہ ہی خاندانوں میں دھڑے بندی رہی ہے۔ منی پور میں بھی ایسا ہی ہوا تھا۔ انگریز اس صورتحال سے فائدہ اٹھانا چاہتے تھے۔ ٹکندرجیت سنگھ نے کئی بار بادشاہ سورچندر کو متنبہ کیا۔ لیکن وہ لاتعلق رہے۔ اس سے ناراض ہو کر ، تیکنجیت سنگھ نے 22 ستمبر 1890 کو انگاسین ، جیلنگبہ جیسے بہت سے بہادر اور غیر ملکی نژاد ساتھیوں کے ساتھ بغاوت کی۔
اس سرکشی کے خوف سے ، بادشاہ فرار ہوگیا۔ اب کل چندر کو بادشاہ بنا دیا گیا تھا اور ٹیکندرجیت سنگھ کو ولی عہد شہزادہ اور کمانڈر بنایا گیا تھا۔ سابق بادشاہ سر چندر نے ٹکیندرجیت سنگھ کو مطلع کیا کہ وہ بادشاہت چھوڑ کر ہمیشہ کے لئے ورینداون جانا چاہتے ہیں۔ لیکن ورینداون کی بجائے ، وہ کلکتہ میں برطانوی وائسرائے لانس ڈاون پہنچے اور اپنی بادشاہی کو واپس حاصل کرنے کے لئے دعا کی۔
وائسرائے ، اس پر ، آسام کے کمشنر J.W. کوئنٹن سے مانی پور پر حملہ کرنے کو کہا۔ اس نے تکیندرجیت سنگھ کو پکڑنے کی خواہش کی۔ چونکہ وہ اس اصول کے تخلیق کار اور سرپرست تھے۔ کلنٹن 400 فوجیوں کے ساتھ 22 مارچ 1891 کو منی پور پہنچا۔ اس ٹیم کی قیادت کرنل کو اسکین کررہی تھی۔ اس نے شاہ کلچندرا سے کہا کہ ہمیں آپ سے کوئی مسئلہ نہیں ہے۔ آپ آزادانہ طور پر حکمرانی کریں۔ لیکن ہمیں ولی عہد شہزادہ ٹیکندرجیت سنگھ کے حوالے کریں۔
لیکن مغرور بادشاہ تیار نہیں تھا۔ بالآخر 24 مارچ کو کوئنٹن نے راجنیواس 'کنگلا درگ' پر حملہ کیا۔ اس وقت قلعے میں رسیلیہ ادا کی جارہی تھی۔ لوگ بے چین تھے اور اسے دیکھ رہے تھے۔کوئنٹن نے اس غافل حالت میں سیکڑوں مرد ، خواتین اور بچوں کو ہلاک کیا۔ لیکن قلیل ہی میں قلعہ میں واقع فوج نے بھی اقتدار سنبھال لیا۔ اس سے انگریز پیچھے ہٹ گئے۔ مشتعل شہریوں نے پانچ برطانوی افسروں کو پکڑ کر پھانسی دے دی۔ کلنٹن اور ان کے پولیٹیکل ایجنٹ بھی گرم ووڈ تھے۔
جیسے ہی برطانوی فوج کو اس شکست کے بارے میں اطلاع ملی ، کوہیما ، سلچار اور تامو سے تین بڑی فوج بھیج دی گئی۔ 31 مارچ 1891 کو انگریزوں نے منی پور حکومت کے خلاف جنگ کا اعلان کیا۔ ٹکندرجیت سنگھ نے بڑی طاقت کے ساتھ برطانوی فوج کا مقابلہ کیا۔ لیکن ان کے ذرائع محدود تھے۔ آخر کار ، 27 اپریل 1891 کو ، برطانوی فوج نے کنگلا قلعہ پر قبضہ کرلیا۔
انگریزوں نے مانی پور کو خاندان کے ایک بچے چاروچندر سنگھ ، راجہ اور میجر میکسویل کے تحت اپنا سیاسی مشیر بنا لیا۔ ٹکندرجیت سنگھ زیر زمین چلا گیا۔ لیکن آخر کار وہ 23 مئی کو پکڑے گئے۔ انگریز نے انفال (موجودہ ویر ٹیکندرجیت سنگھ میدان) کے پولو میدان میں 13 اگست 1891 کو اس کو اور اس کے ساتھی جنرل تھانگل کو مقدمہ چلایا اور اسے پھانسی دے دی۔


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